# Sahityalaya ## Posts - [कविता - शक्ति और क्षमा](https://sahityalaya.com/%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%ae%e0%a4%be/): क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल सबका लिया सहारा पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे कहो, कहाँ कब हारा ? क्षमाशील हो रिपु-समक्ष तुम हुये विनत जितना ही दुष्ट कौरवों ने तुमको कायर समझा उतना ही। अत्याचार सहन करने का कुफल यही होता है पौरुष का आतंक मनुज कोमल होकर खोता है। क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो उसको क्या जो दंतहीन विषरहित, विनीत, सरल हो। तीन दिवस तक पंथ मांगते रघुपति सिन्धु किनारे, बैठे पढ़ते रहे छन्द अनुनय के प्यारे-प्यारे। उत्तर में जब एक नाद भी उठा नहीं सागर से उठी अधीर धधक पौरुष की आग राम के शर ...
- [लघुकथा - स्वार्थी राक्षस](https://sahityalaya.com/%e0%a4%b2%e0%a4%98%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%b8/): प्रत्येक दोपहरी को, जैसे ही बच्चे स्कूल से आते थे, वे सभी राक्षस के बगीचे में जाकर खेलते थे। यह एक बहुत बड़ा और प्यारा बगीचा था, जिसमें मुलायम हरी घास थी। घास पर यहां-वहां सितारों जैसे सुन्दर फूल लगे हुए थे, वहां बारह आड़ू के वृक्ष भी थे, जो वसंत ऋतु में गुलाबी और मोती के समान सफेद फूलों से खिल उठते थे और शरद ऋतु में उनपर खूब फल लगते थे। पक्षी वृक्षों पर बैठकर इतना मधुर गीत गाते थे कि बच्चे उन्हें सुनने के लिए अपना खेल रोक देते थे। “हम लोग यहां कितने खुश हैं!” वे ... - [साहित्य और सिनेमा का अन्तर्सम्बन्ध](https://sahityalaya.com/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4/): साहित्य और सिनेमा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों का कार्य लगभग एक ही है। समाज में जो भी घटनाएं घटित होती हैं, उनका प्रतिबिंब हमें साहित्य और सिनेमा दोनों में देखने को मिलता है। इस समानता के बावजूद सिनेमा का क्षेत्र अधिक विस्तृत है। इसकी पहुंच उन लोगों तक भी है, जो लिखना और पढ़ना नहीं जानते। इससे एक बात तो स्पष्ट है कि सिनेमा समाज को सबसे अधिक प्रभावित करता है। हमारे देश में तो लोगों का खाना, पीना, पहनना, ओढ़ना सब कुछ सिनेमा पर निर्भर है। ऐसे में फिल्मकारों का यह दायित्व बन जाता है ... - [पीटर खरगोश की कहानी](https://sahityalaya.com/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a5%a4-%e0%a4%aa%e0%a5%80%e0%a4%9f%e0%a4%b0-%e0%a4%96%e0%a4%b0%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%b6-%e0%a4%95/): एक बार की बात है, चार छोटे खरगोश थे, जिनके नाम- फ्लॉप्सी, मोप्सी, कॉटन-टेल और पीटर थे। वे अपनी मां के साथ एक बालू के टीले पर, बहुत बड़े देवदार वृक्ष की जड़ के नीचे रहते थे। “अब, मेरे प्यारे बच्चों,” एक सुबह बूढ़ी श्रीमती खरगोश ने कहा, “तुम मैदान में या नीचे गली में जा सकते हो, लेकिन मिस्टर मैकग्रेगर के बगीचे में मत जाना । तुम्हारे पिता के साथ वहां एक दुर्घटना हो गई थी; उन्हें श्रीमती मैकग्रेगर ने मुसीबत में डाल दिया था।” “अब, सब निकलो, और शरारत मत करना। मैं बाहर जा रही हूं।” फिर बूढ़ी ... - [लघुकथा- एक दलदली दानव](https://sahityalaya.com/%e0%a4%b2%e0%a4%98%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b5/): एक बार एक महिला थी जो बहुत ही हंसमुख थी, हालांकि ऐसा बना रहने के लिए उसके पास बहुत ही कम अवसर होते थे। क्योंकि वह बूढ़ी, गरीब और अकेली थी। वह एक छोटी सी झोपड़ी में रहती थी और अपने पड़ोसियों का छोटा-मोटा काम करके बहुत कम में गुज़ारा करती थी, अपनी सेवाओं के लिए उसे इनाम स्वरूप यहां-वहां, कुछ न कुछ खाने-पीने को मिल जाता था। इसी तरह उसका जीवन व्यतीत होता था, और वह सदैव फुर्तीली और खुशमिज़ाज नज़र आती थी, जैसे उसे इस दुनिया में किसी चीज़ की ज़रूरत न हो। अब एक गर्मी की शाम ... - [लघुकथा - माचिस वाली एक छोटी लड़की](https://sahityalaya.com/%e0%a4%b2%e0%a4%98%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%b8-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%9b%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a5%80/): कड़ाके की ठंड थी, बर्फ गिर रही थी, और लगभग अंधेरा हो गया था। संध्या का समय था, इस साल की आखिरी संध्या। इस ठंड और अंधेरे में एक गरीब छोटी लड़की नंगे पैर और नंगे सिर सड़क पर चल रही थी। यह सच है कि जब वह घर से निकली थी, तब उसने चप्पलें पहनी हुई थीं ; लेकिन उनका महत्व क्या था ? वे चप्पलें बहुत बड़ी थीं, जिन्हें अब तक उसकी मां पहना करती थी; वे बहुत ही बड़ी थीं ; और उस गरीब छोटी बच्ची ने उन्हें उस समय खो दिया, जब वह दो बड़ी तेजी ... - [भूमंडलीकरण और हिन्दी सिनेमा](https://sahityalaya.com/%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a3-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8/): हमारे देश में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा बहुत पहले से चली आ रही है। अर्थात हम लोग पूरे विश्व को एक परिवार मानते हैं। लेकिन यह अवधारणा सांस्कृतिक थी , इसमें व्यवसाय नहीं था। आज हम जिस वैश्वीकरण की बात करते हैं , उसके केन्द्र में व्यवसाय है। दरअसल भूमंडलीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें सम्पूर्ण विश्व के लोग मिलकर एक साथ कार्य करते हैं। कुछ विद्वानों के द्वारा भूमंडलीकरण को आर्थिक अवधारणा माना जाता है और कुछ इसे सांस्कृतिक आदान-प्रदान की प्रक्रिया मानते हैं। इसकी हमें विभिन्न परिभाषाएं मिलती हैं। काटो संस्थान के टॉम. जी. पामर भूमंडलीकरण को परिभाषित ... - [हिन्दी सिनेमा और स्त्री चिंतन](https://sahityalaya.com/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%9a/): हिन्दी सिनेमा और स्त्री चिंतन पर चर्चा करने से पहले मैं आप लोगों को फ्लैशबैक में ले जाना चाहूंगा। जब ‘दादा साहेब फाल्के’ भारतीय सिनेमा की पहली फीचर फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ बना रहे थे। यह एक मूक फिल्म थी। इसमें उन्हें राजा हरिश्चन्द्र की पत्नी ‘तारामती’ के रोल के लिए एक स्त्री पात्र की आवश्यकता थी। काफी खोजबीन के बाद भी जब वह इसमें सफल न हो सके ,तब मजबूरन एक ‘अन्ना सालुंके’ नामक व्यक्ति ने यह भूमिका निभाई थी। यानी भारतीय समाज ने सिनेमा को सहज स्वीकार नहीं किया था। और उस समय स्त्रियों की स्थिति यह थी कि ... - [भारतीय समाज पर हिन्दी सिनेमा का प्रभाव](https://sahityalaya.com/%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf/): हमारे देश में सिनेमा मनोरंजन का एक बड़ा ही सशक्त माध्यम है। जीवन में आए तनावों को कम करने में यह एक प्रभावशाली भूमिका निभाता है, इसीलिए भारतीय समाज में सिनेमा को एक विशेष स्थान प्राप्त है। जिसे प्रकाशित करने पर हमारे सामने भारत की संस्कृति, सभ्यता, इतिहास, भाषा आदि उभरकर सामने आते हैं। क्योंकि ये सब भारतीय सिनेमा में किसी न किसी रूप में समाहित होते हैं। “सिनेमा के पास सम्प्रेषण की जो सशक्त ताकत है, वह उसे अपेक्षाओं की भारी-भरकम सूची थमा देती है। यही कारण है कि सिनेमा से बस मनोरंजन की आशा नहीं की जाती बल्कि ... ## Pages - [My account](https://sahityalaya.com/my-account/) - [Checkout](https://sahityalaya.com/checkout/) - [Cart](https://sahityalaya.com/cart/) - [Shop](https://sahityalaya.com/shop/) - [Advertise With Us](https://sahityalaya.com/advertise-with-us/) - [प्रसिद्ध कथन](https://sahityalaya.com/1418-2/) - [सुभद्रा कुमारी चौहान (बाल काव्य)](https://sahityalaya.com/%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%ad%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b2/): रामायण की कथा आज नहीं रुक सकता अम्मां जाऊंगा मैं बाहर रामायण की कथा हो रही होगी सरला के घर । मेरे ही आगे उसके घर आया था हलवाई पूजा में प्रसाद रखने को वह दे गया मिठाई । पूजा हो जाने पर बंटता है प्रसाद मनमाना चाहो तो प्रसाद लेने को मां तुम भी आ जाना । क्या कहती हो अभी धूप है अभी न बाहर जाऊं यह क्या मां, जब अभी जा रहे थे काका जी बाहर तब भी तो थी धूप गए थे वे भी तो नंगे सर । उन्हें नहीं रोका था तुमने मुझे रोकती जातीं ... - [अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ (बाल काव्य)](https://sahityalaya.com/%e0%a4%85%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9-%e0%a4%89%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%af-%e0%a4%b9/): जागो प्यारे उठो लाल अब आँखे खोलो पानी लाई हूँ मुँह धो लो बीती रात कमल दल फूले उनके ऊपर भंवरे डोले चिड़िया चहक उठी पेड़ पर बहने लगी हवा अति सुंदर नभ में न्यारी लाली छाई धरती ने प्यारी छवि पाई भोर हुआ सूरज उग आया जल में पड़ी सुनहरी छाया ऐसा सुंदर समय न खोओ मेरे प्यारे अब मत सोओ - [बाल कविताएं](https://sahityalaya.com/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%8f%e0%a4%82/) - [पंचतन्त्र की कहानी - ब्राह्मण-कर्कटक कथा](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b9-2/): किसी नगर में ब्रह्मदत्त नामक एक ब्राह्मण रहता था। एक बार किसी काम से उसे दूसरे गाँव जाना पड़ा। उसकी माँ ने कहा, “पुत्र, तुम अकेले मत जाओ। किसीको साथ ले लो।” ब्राह्मण ने कहा, ”माँ, इस रास्ते में कोई ऐसा डर नहीं है। मैं अकेला ही चला जाऊँगा।” फिर भी चलते समय उसकी माँ एक केकड़ा पकड़ लाई और बोली, ”तुम्हें जाना ही है, तो इस केकड़े को साथ ले जाओ। एक से दो भले। समय पड़ने पर काम आएगा।” ब्राह्मण ने माँ की बात मान ली और केकड़े को कपूर की पूड़िया में रखकर अपने झोले में डाल ... - [पंचतन्त्र की कहानी - दो सिर वाला पक्षी](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%8b-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%b0-2/): एक तालाब में भारण्ड नाम का एक विचित्र पक्षी रहता था । इसके मुख दो थे, किन्तु पेट एक ही था । एक दिन समुद्र के किनारे घूमते हुए उसे एक अमृतसमान मधुर फल मिला । यह फल समुद्र की लहरों ने किनारे पर फैंक दिया था । उसे खाते हुए एक मुख बोला- “ओः, कितना मीठा है यह फल ! आज तक मैंने अनेक फल खाये, लेकिन इतना स्वादु कोई नहीं था । न जाने किस अमृत बेल का यह फल है ।” दूसरा मुख उससे वंचित रह गया था । उसने भी जब उसकी महिमा सुनी तो पहले ... - [पंचतन्त्र की कहानी - राक्षस का भय](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7/): एक नगर में भद्रसेन नाम का राजा रहता था। उसकी कन्या रत्नवती बहुत रुपवती थी। उसे हर समय यही डर रहता था कि कोई राक्षस उसका अपहरण न करले । उसके महल के चारों ओर पहरा रहता था, फिर भी वह सदा डर से कांपती रहती थी । रात के समय उसका डर और भी बढ़ जाता था । एक रात एक राक्षस पहरेदारों की नज़र बचाकर रत्नवती के घर में घुस गया । घर के एक अंधेरे कोने में जब वह छि़पा हुआ था तो उसने सुना कि रत्नवती अपनी एक सहेली से कह रही है “यह दुष्ट विकाल ... - [पंचतन्त्र की कहानी - वानरराज का बदला](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b0%e0%a4%b0/): एक नगर के राजा चन्द्र के पुत्रों को बन्दरों से खेलने का व्यसन था । बन्दरों का सरदार भी बड़ा चतुर था । वह सब बन्दरों को नीतिशास्त्र पढ़ाया करता था । सब बन्दर उसकी आज्ञा का पालन करते थे । राजपुत्र भी उन बन्दरों के सरदार वानरराज को बहुत मानते थे । उसी नगर के राजगृह में छो़टे राजपुत्र के वाहन के लिये कई मेढे भी थे । उन में से एक मेढा बहुत लोभी था । वह जब जी चाहे तब रसोई में घुस कर सब कुछ खा लेता था । रसोइये उसे लकड़ी से मार कर बाहिर ... - [पंचतन्त्र की कहानी - दो सिर वाला जुलाहा](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%8b-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%b0/): एक बार मन्थरक नाम के जुलाहे के सब उपकरण, जो कपड़ा बुनने के काम आते थे, टूट गये । उपकरणों को फिर बनाने के लिये लकड़ी की जरुरत थी । लकड़ी काटने की कुल्हाड़ी लेकर वह समुद्रतट पर स्थित वन की ओर चल दिया । समुद्र के किनारे पहुँचकर उसने एक वृक्ष देखा और सोचा कि इसकी लकड़ी से उसके सब उपकरण बन जायेंगे । यह सोच कर वृक्ष के तने में वह कुल्हाडी़ मारने को ही था कि वृक्ष की शाखा पर बैठे हुए एक देव ने उसे कहा- -“मैं इस वृक्ष पर आनन्द से रहता हूँ, और समुद्र ... - [पंचतन्त्र की कहानी - संगीतमय गधा](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4/): एक धोबी का गधा था। गधे का नाम था–उद्धत। वह दिन भर कपडों के गट्ठर इधर से उधर ढोने में लगा रहता। धोबी स्वयं कंजूस और निर्दयी था। अपने गधे के लिए चारे का प्रबंध नहीं करता था। बस रात को चरने के लिए खुला छोड देता। निकट में कोई चरागाह भी नहीं थी। शरीर से गधा बहुत दुर्बल हो गया था। एक रात उस गधे की मुलाकात एक गीदड़ से हुई। गीदड़ ने उससे पूछा ‘कहिए महाशय, आप इतने कमज़ोर क्यों हैं?’ गधे ने दुखी स्वर में बताया कि कैसे उसे दिन भर काम करना पडता है। खाने को ... - [पंचतन्त्र की कहानी - दो मछलियाँ और एक मेंढक](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%8b-%e0%a4%ae%e0%a4%9b%e0%a4%b2/): एक तालाब में दो मछलियाँ रहती थीं । एक थी शतबुद्धि (सौ बुद्धियों वाली), दूसरी थी सहस्त्रबुद्धि (हजार बुद्धियों वाली) । उसी तालाब में एक मेंढक भी रहता था । उसका नाम था एकबुद्धि । उसके पास एक ही बुद्धि थी । इसलिये उसे बुद्धि पर अभिमान नहीं था । शतबुद्धि और सहस्त्रबुद्धि को अपनी चतुराई पर बड़ा अभिमान था। एक दिन सन्ध्या समय तीनों तालाब के किनारे बात-चीत कर रहे थे। उसी समय उन्होंने देखा कि कुछ मछि़यारे हाथों में जाल लेकर वहाँ आये । उनके जाल में बहुत सी मछलियाँ फँस कर तड़प रही थीं । तालाब के ... - [पंचतन्त्र की कहानी - जब शेर जी उठा](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%ac-%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%b0/): एक नगर में चार मित्र रहते थे । उनमें से तीन बड़े वैज्ञानिक थे, किन्तु बुद्धिरहित थे; चौथा वैज्ञानिक नहीं था, किन्तु बुद्धिमान् था । चारों ने सोचा कि विद्या का लाभ तभी हो सकता है, यदि वे विदेशों में जाकर धन संग्रह करें । इसी विचार से वे विदेशयात्रा को चल पड़े । कुछ़ दूर जाकर उनमें से सब से बड़े ने कहा-“हम चारों विद्वानों में एक विद्या-शून्य है, वह केवल बुद्धिमान् है । धनोपार्जन के लिये और धनिकों की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिये विद्या आवश्यक है । विद्या के चमत्कार से ही हम उन्हें प्रभावित कर सकते ... - [पंचतन्त्र की कहानी - मस्तक पर चक्र](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%95/): एक नगर में चार ब्राह्मण पुत्र रहते थे । चारों में गहरी मैत्री थी । चारों ही निर्धन थे । निर्धनता को दूर करने के लिए चारों चिन्तित थे । उन्होंने अनुभव कर लिया था कि अपने बन्धु-बान्धवों में धनहीन जीवन व्यतीत करने की अपेक्षा शेर-हाथियों से भरे कंटीले जङगल में रहना अच्छा़ है । निर्धन व्यक्ति को सब अनादर की दृष्टि से देखते हैं, बन्धु-बान्धव भी उस से किनारा कर लेते हैं, अपने ही पुत्र-पौत्र भी उस से मुख मोड़ लेते हैं, पत्नी भी उससे विरक्त हो जाती है । मनुष्यलोक में धन्के बिना न यश संभव है, न ... - [पंचतन्त्र की कहानी - ब्राह्मणी और नेवला](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b9/): एक बार देवशर्मा नाम के ब्राह्मण के घर जिस दिन पुत्र का जन्म हुआ उसी दिन उसके घर में रहने वाली नकुली ने भी एक नेवले को जन्म दिया । देवशर्मा की पत्नी बहुत दयालु स्वभाव की स्त्री थी । उसने उस छो़टे नेवले को भी अपने पुत्र के समान ही पाल-पोसा और बड़ा किया । वह नेवला सदा उसके पुत्र के साथ खेलता था । दोनों में बड़ा प्रेम था । देवशर्मा की पत्नी भी दोनों के प्रेम को देखकर प्रसन्न थी । किन्तु, उसके मन में यह शंका हमेशा रहती थी कि कभी यह नेवला उसके पुत्र को ... - [पंचतन्त्र की कहानी - स्त्री-भक्त राजा](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-2/): एक राज्य में अतुलबल पराक्रमी राजा नन्द राज्य करता था । उसकी वीरता चारों दिशाओं में प्रसिद्ध थी । आसपास के सब राजा उसकी वन्दना करते थे । उसका राज्य समुद्र-तट तक फैला हुआ था । उसका मन्त्री वररुचि भी बड़ा विद्वान् और सब शास्त्रों में पारंगत था । उसकी पत्नी का स्वभाव बड़ा तीखा था । एक दिन वह प्रणय-कलह में ही ऐसी रुठ गई कि अनेक प्रकार से मनाने पर भी न मानी । तब, वररुचि ने उससे पूछा़ – “प्रिये ! तेरी प्रसन्नता के लिये मैं सब कुछ़ करने को तैयार हूँ । जो तू आदेश करेगी, ... - [पंचतन्त्र की कहानी - स्त्री का विश्वास](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/): एक स्थान पर एक ब्राह्मण और उसकी पत्नी बड़े प्रेम से रहते थे । किन्तु ब्राह्मणी का व्यवहार ब्राह्मण के कुटुम्बियों से अच्छा़ नहीं था । परिवार में कलह रहता था । प्रतिदिन के कलह से मुक्ति पाने के लिये ब्राह्मण ने मां-बाप, भाई-बहिन का साथ छो़ड़कर पत्नी को लेकर दूर देश में जाकर अकेले घर बसाकर रहने का निश्चय किया । यात्रा लंबी थी । जंगल में पहुँचने पर ब्राह्मणी को बहुत प्यास लगी । ब्राह्मण पानी लेने गया । पानी दूर था, देर लग गई । पानी लेकर वापिस आया तो ब्राह्मणी को मरी पाया । ब्राह्मण बहुत ... - [पंचतन्त्र की कहानी - कुत्ते का वैरी कुत्ता](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4/): एक गाँव में चित्रांग नाम का कुत्ता रहता था । वहां दुर्भिक्ष पड़ गया । अन्न के अभाव में कई कुत्तों का वंशनाश हो गया । अन्न के अभाव में कई कुत्तों का वंशनाश हो गया । चित्रांग ने भी दुर्भिक्ष से बचने के लिये दूसरे गाँव की राह ली । वहाँ पहुँच कर उसने एक घर में चोरी से जाकर भरपेट खाना खा लिया । जिसके घर खाना खाया था उसने तो कुछ़ नहीं कहा, लेकिन घर से बाहर निकला तो आसपास के सब कुत्तों ने उसे घेर लिया । भयङकर लड़ाई हुई । चित्रांग के शरीर पर कई ... - [पंचतन्त्र की कहानी - सियार की रणनीति](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b0/): एक जंगल में महाचतुरक नामक सियार रहता था। एक दिन जंगल में उसने एक मरा हुआ हाथी देखा। उसकी बांछे खिल गईं। उसने हाथी के मृत शरीर पर दांत गड़ाया पर चमड़ी मोटी होने की वजह से, वह हाथी को चीरने में नाकाम रहा। वह कुछ उपाय सोच ही रहा था कि उसे सिंह आता हुआ दिखाई दिया। आगे बढ़कर उसने सिंह का स्वागत किया और हाथ जोड़कर कहा, “स्वामी आपके लिए ही मैंने इस हाथी को मारकर रखा है, आप इस हाथी का मांस खाकर मुझ पर उपकार कीजिए।” सिंह ने कहा, “मैं तो किसी के हाथों मारे गए ... - [पंचतन्त्र की कहानी - घमंड का सिर नीचा](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%98%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a1-%e0%a4%95/): एक गांव में उज्वलक नाम का बढ़ई रहता था । वह बहुत गरीब था । ग़रीबी से तंग आकर वह गांव छो़ड़कर दूसरे गांव के लिये चल पड़ा । रास्ते में घना जंगल पड़ता था । वहां उसने देखा कि एक ऊंटनी प्रसवपीड़ा से तड़फड़ा रही है । ऊँटनी ने जब बच्चा दिया तो वह उँट के बच्चे और ऊँटनी को लेकर अपने घर आ गया । वहां घर के बाहर ऊँटनी को खूंटी से बांधकर वह उसके खाने के लिये पत्तों-भरी शाखायें काटने वन में गया । ऊँटनी ने हरी-हरी कोमल कोंपलें खाईं । बहुत दिन इसी तरह हरे-हरे ... - [पंचतन्त्र की कहानी - शेर की खाल में गधा](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80/): एक शहर में शुद्धपट नाम का धोबी रहता था । उसके पास एक गधा भी था । घास न मिलने से वह बहुत दुबला हो गया । धोबी ने तब एक उपाय सोचा । कुछ दिन पहले जंगल में घूमते-घूमते उसे एक मरा हुआ शेर मिला था, उसकी खाल उसके पास थी । उसने सोचा यह खाल गधे को ओढ़ा कर खेत में भेज दूंगा, जिससे खेत के रखवाले इसे शेर समझकर डरेंगे और इसे मार कर भगाने की कोशिश नहीं करेंगे । धोबी की चाल चल गई । हर रात वह गधे को शेर की खाल पहना कर खेत ... - [पंचतन्त्र की कहानी - गीदड़ गीदड़ है और शेर शेर](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a6%e0%a4%a1%e0%a4%bc/): एक जंगल में शेर-शेरनी का युगल रहता था । शेरनी के दो बच्चे हुए । शेर प्रतिदिन हिरणों को मारकर शेरनी के लिये लाता था । दोनों मिलकर पेट भरते थे । एक दिन जंगल में बहुत घूमने के बाद भी शाम होने तक शेर के हाथ कोई शिकार न आया । खाली हाथ घर वापिस आ रहा था तो उसे रास्ते में गीदड़ का बच्चा मिला। बच्चे को देखकर उसके मन में दया आ गई; उसे जीधित ही अपने मुख में सुरक्षा-पूर्वक लेकर वह घर आ गया और शेरनी के सामने उसे रखते हुए बोला- “प्रिये ! आज भोजन ... - [पंचतन्त्र की कहानी - कुम्हार की कहानी](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b9/): युधिष्ठिर नाम का कुम्हार एक बार टूटे हुए घड़े के नुकीले ठीकरे से टकरा कर गिर गया । गिरते ही वह ठीकरा उसके माथे में घुस गया । खून बहने लगा । घाव गहरा था, दवा-दारु से भी ठीक न हुआ । घाव बढ़ता ही गया । कई महीने ठीक होने में लग गये । ठीक होने पर भी उसका निशान माथे पर रह गया । कुछ दिन बाद अपने देश में दुर्भिक्ष पड़ने पर वह एक दूसरे देश में चला गया । वहाँ वह राजा के सेवकों में भर्ती हो गया । राजा ने एक दिन उसके माथे पर ... - [पंचतन्त्र की कहानी - शेर, गीदड़ और मूर्ख गधा](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%97%e0%a5%80/): एक घने जंगल में करालकेसर नाम का शेर रहता था । उसके साथ धूसरक नाम का गीदड़ भी सदा सेवाकार्य के लिए रहा करता था । शेर को एक बार एक मत्त हाथी से लड़ना पड़ा था, तब से उसके शरीर पर कई घाव हो गये थे । एक टाँग भी इस लड़ाई में टूट गई थी । उसके लिये एक क़दम चलना भी कठिन हो गया था । जङगल में पशुओं का शिकार करना उसकी शक्ति से बाहर था । शिकार के बिना पेट नहीं भरता था । शेर और गीदड़ दोनों भूख से व्याकुल थे । एक दिन ... - [पंचतन्त्र की कहानी - मेंढकराज और नाग](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%a2%e0%a4%95/): एक कुएं में बहुत से मेंढक रहते थे। उनके राजा का नाम था गंगदत्त। गंगदत्त बहुत झगड़ालू स्वभाव का था। आसपास दो-तीन और भी कुएं थे। उनमें भी मेंढक रहते थे। हर कुएं के मेंढकों का अपना राजा था। हर राजा से किसी न किसी बात पर गंगदत्त का झगड़ा चलता ही रहता था। वह अपनी मूर्खता से कोई गलत काम करने लगता और बुद्धिमान मेंढक रोकने की कोशिश करता तो मौका मिलते ही अपने पाले गुंडे मेंढकों से पिटवा देता। कुएं के मेंढकों के भीतर गंगदत्त के प्रति रोष बढ़ता जा रहा था। घर में भी झगड़ों से चैन ... - [पंचतन्त्र की कहानी - बंदर और मगरमच्छ](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%b0-%e0%a4%94/): एक नदी के किनारे एक जामुन के पेड़ पर एक बन्दर रहता था। उस पेड़ पर बहुत ही मीठे-मीठे जामुन लगते थे। एक दिन एक मगरमच्छ खाना तलाशते हुए पेड़ के पास आया। बन्दर ने उससे पूछा तो उसने अपने आने की वजह बताई। बन्दर ने बताया की यहाँ बहुत ही मीठे जामुन लगते हैं और उसने वो जामुन मगरमछ को दिए। उसकी मित्रता नदी में रहने वाले मगरमच्छ के साथ हो गयी। वह बन्दर उस मगरमच्छ को रोज़ खाने के लिए जामुन देता रहता था। एकदिन उस मगरमच्छ ने कुछ जामुन अपनी पत्नी को भी खिलाये। स्वादिष्ट जामुन खाने ... - [पंचतन्त्र की कहानी - कौवे और उल्लू का युद्ध](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%b5%e0%a5%87-%e0%a4%94/): दक्षिण देश में महिलारोप्य नाम का एक नगर था । नगर के पास एक बड़ा पीपल का वृक्ष था । उसकी घने पत्तों से ढकी शाखाओं पर पक्षियों के घोंसले बने हुए थे । उन्हीं में से कुछ घोंसलों में कौवों के बहुत से परिवार रहते थे । कौवों का राजा वायसराज मेघवर्ण भी वहीं रहता था । वहाँ उसने अपने दल के लिये एक व्यूह सा बना लिया था । उससे कुछ दूर पर्वत की गुफा में उल्लओं का दल रहता था । इनका राजा अरिमर्दन था । दोनों में स्वाभाविक वैर था । अरिमर्दन हर रात पीपल के ... - [पंचतन्त्र की कहानी - वंश की रक्षा](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%82%e0%a4%b6-%e0%a4%95%e0%a5%80/): किसी पर्वत प्रदेश में मन्दविष नाम का एक वृद्ध सर्प रहा करता था। एक दिन वह विचार करने लगा कि ऐसा क्या उपाय हो सकता है, जिससे बिना परिश्रम किए ही उसकी आजीविका चलती रहे। उसके मन में तब एक विचार आया। वह समीप के मेंढकों से भरे तालाब के पास चला गया। वहां पहुँचकर वह बड़ी बेचैनी से इधर-उधर घूमने लगा। उसे इस प्रकार घूमते देखकर तालाब के किनारे एक पत्थर पर बैठे मेंढक को आश्चर्य हुआ तो उसने पूछा, “मामा! आज क्या बात है? शाम हो गई है, किन्तु तुम भोजन-पानी की व्यवस्था नहीं कर रहे हो?” सर्प ... - [पंचतन्त्र की कहानी - बोलने वाली गुफा](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%a8%e0%a5%87/): किसी जंगल में एक शेर रहता था। एक बार वह दिन-भर भटकता रहा, किंतु भोजन के लिए कोई जानवर नहीं मिला। थककर वह एक गुफा के अंदर आकर बैठ गया। उसने सोचा कि रात में कोई न कोई जानवर इसमें अवश्य आएगा। आज उसे ही मारकर मैं अपनी भूख शांत करुँगा। उस गुफा का मालिक एक सियार था। वह रात में लौटकर अपनी गुफा पर आया। उसने गुफा के अंदर जाते हुए शेर के पैरों के निशान देखे। उसने ध्यान से देखा। उसने अनुमान लगाया कि शेर अंदर तो गया, परंतु अंदर से बाहर नहीं आया है। वह समझ गया ... - [पंचतन्त्र की कहानी - मूर्खमंडली](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%96/): एक पर्वतीय प्रदेश के महाकाय वृक्ष पर सिन्धुक नाम का एक पक्षी रहता था । उसकी विष्ठा में स्वर्ण-कण होते थे । एक दिन एक व्याध उधर से गुजर रहा था । व्याध को उसकी विष्ठा के स्वर्णमयी होने का ज्ञान नहीं था । इससे सम्भव था कि व्याध उसकी उपेक्षा करके आगे निकल जाता । किन्तु मूर्ख सिन्धुक पक्षी ने वृक्ष के ऊपर से व्याध के सामने ही स्वर्ण-कण-पूर्ण विष्ठा कर दी । उसे देख व्याध ने वृक्ष पर जाल फैला दिया और स्वर्ण के लोभ से उसे पकड़ लिया । उसे पकड़कर व्याध अपने घर ले आया । ... - [पंचतन्त्र की कहानी - चुहिया का स्वयंवर](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%af/): गंगा नदी के किनारे एक तपस्वियों का आश्रम था । वहाँ याज्ञवल्क्य नाम के मुनि रहते थे । मुनिवर एक नदी के किनारे जल लेकर आचमन कर रहे थे कि पानी से भरी हथेली में ऊपर से एक चुहिया गिर गई । उस चुहिया को आकाश मेम बाज लिये जा रहा था । उसके पंजे से छूटकर वह नीचे गिर गई । मुनि ने उसे पीपल के पत्ते पर रखा और फिर से गंगाजल में स्नान किया । चुहिया में अभी प्राण शेष थे । उसे मुनि ने अपने प्रताप से कन्या का रुप दे दिया, और अपने आश्रम में ... - [पंचतन्त्र की कहानी - घर का भेद/दो सांप](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%98%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ad/): एक नगर में देवशक्ति नाम का राजा रहता था । उसके पुत्र के पेट में एक साँप चला गया था । उस साँप ने वहीं अपना बिल बना लिया था । पेट में बैठे साँप के कारण उसके शरीर का प्रति-दिन क्षय होता जा रहा था । बहुत उपचार करने के बाद भी जब स्वास्थ्य में कोई सुधार न हुआ तो अत्यन्त निराश होकर राजपुत्र अपने राज्य से बहुत दूर दूसरे प्रदेश में चला गया । और वहाँ सामान्य भिखारी की तरह मन्दिर में रहने लगा । उस प्रदेश के राजा बलि की दो नौजवान लड़कियाँ थीं । वह दोनों ... - [पंचतंत्र की कहानी - ब्राह्मण, चोर, और दानव](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a5%8d-3/): एक गाँव में द्रोण नाम का ब्राह्मण रहता था । भिक्षा माँग कर उसकी जीविका चलती थी । सर्दी-गर्मी रोकने के लिये उसके पास पर्याप्त वस्त्र भी नहीं थे । एक बार किसी यजमान ने ब्राह्मण पर दया करके उसे बैलों की जोड़ी दे दी । ब्राह्मण ने उनका भरन-पोषण बड़े यत्न से किया । आस-पास से घी-तेल-अनाज माँगकर भी उन बैलों को भरपेट खिलाता रहा । इससे दोनों बैल खूब मोटे-ताजे हो गये । उन्हें देखकर एक चोर के मन में लालच आ गया । उसने चोरी करके दोनों बैलों को भगा लेजाने का निश्चय कर लिया । इस ... - [पंचतंत्र की कहानी - बूढ़ा आदमी, युवा पत्नी और चोर](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a5%82%e0%a4%a2%e0%a4%bc%e0%a4%be-%e0%a4%86/): किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी। एक दिन किसी ठग ने उसको घर से निकलते हुए देख लिया। उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा, “देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।” वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो ... - [पंचतंत्र की कहानी - ब्राह्मण और सर्प](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a5%8d-2/): किसी नगर में हरिदत्त नाम का एक ब्राह्मण निवास करता था। उसकी खेती साधारण ही थी, अतः अधिकांश समय वह खाली ही रहता था। एक बार ग्रीष्म ऋतु में वह इसी प्रकार अपने खेत पर वृक्ष की शीतल छाया में लेटा हुआ था। सोए-सोए उसने अपने समीप ही सर्प का बिल देखा, उस पर सर्प फन फैलाए बैठा था। उसको देखकर वह ब्राह्मण विचार करने लगा कि हो-न-हो, यही मेरे क्षेत्र का देवता है। मैंने कभी इसकी पूजा नहीं की। अतः मैं आज अवश्य इसकी पूजा करूंगा। यह विचार मन में आते ही वह उठा और कहीं से जाकर दूध ... - [पंचतंत्र की कहानी - कबूतर का जोड़ा और शिकारी](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%82%e0%a4%a4%e0%a4%b0-%e0%a4%95/): एक जगह एक लोभी और निर्दय व्याध रहता था । पक्षियों को मारकर खाना ही उसका काम था । इस भयङकर काम के कारण उसके प्रियजनों ने भी उसका त्याग कर दिया था । तब से वह अकेला ही, हाथ में जाल और लाठी लेकर जङगलों में पक्षियों के शिकार के लिये घूमा करता था । एक दिन उसके जाल में एक कबूतरी फँस गई । उसे लेकर जब वह अपनी कुटिया की ओर चला तो आकाश बादलों से घिर गया । मूसलधार वर्षा होने लगी । सर्दी से ठिठुर कर व्याध आश्रय की खोज करने लगा । थोड़ी दूरी ... - [पंचतंत्र की कहानी - बिल्ली का न्याय](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80/): एक जंगल में विशाल वृक्ष के तने में एक खोल के अन्दर कपिंजल नाम का तीतर रहता था । एक दिन वह तीतर अपने साथियों के साथ बहुत दूर के खेत में धान की नई-नई कोंपलें खाने चला गया। बहुत रात बीतने के बाद उस वृक्ष के खाली पड़े खोल में ’शीघ्रगो’ नाम का खरगोश घुस आया और वहीं रहने रहने लगा। कुछ दिन बाद कपिंजल तीतर अचानक ही आ गया । धान की नई-नई कोंपले खाने के बाद वह खूब मोटा-ताजा हो गया था । अपनी खोल में आने पर उसने देखा कि वहाँ एक खरगोश बैठा है । ... - [पंचतंत्र की कहानी - हाथी और चतुर खरगोश](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a5%e0%a5%80-%e0%a4%94%e0%a4%b0-2/): एक वन में ’चतुर्दन्त’ नाम का महाकाय हाथी रहता था । वह अपने हाथीदल का मुखिया था । बरसों तक सूखा पड़ने के कारण वहा के सब झील, तलैया, ताल सूख गये, और वृक्ष मुरझा गए । सब हाथियों ने मिलकर अपने गजराज चतुर्दन्त को कहा कि हमारे बच्चे भूख-प्यास से मर गए, जो शेष हैं मरने वाले हैं । इसलिये जल्दी ही किसी बड़े तालाब की खोज की जाय । बहुत देर सोचने के बाद चतुर्दन्त ने कहा—-“मुझे एक तालाब याद आया है । वह पातालगङगा के जल से सदा भरा रहता है । चलो, वहीं चलें ।” पाँच ... - [पंचतंत्र की कहानी - कौवे और उल्लू का बैर](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%b5%e0%a5%87-%e0%a4%94%e0%a4%b0/): एक बार हंस, तोता, बगुला, कोयल, चातक, कबूतर, उल्लू आदि सब पक्षियों ने सभा करके यह सलाह की कि उनका राजा वैनतेय केवल वासुदेव की भक्ति में लगा रहता है; व्याधों से उनकी रक्षा का कोई उपाय नहीं करता; इसलिये पक्षियों का कोई अन्य राजा चुन लिया जाय । कई दिनों की बैठक के बाद सब ने एक सम्मति से सर्वाङग सुन्दर उल्लू को राजा चुना । अभिषेक की तैयारियाँ होने लगीं, विविध तीर्थों से पवित्र जल मँगाया गया, सिंहासन पर रत्न जड़े गए, स्वर्णघट भरे गए, मङगल पाठ शुरु हो गया, ब्राह्मणों ने वेद पाठ शुरु कर दिया, नर्तकियों ... - [पंचतंत्र की कहानी - अभागा बुनकर](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%85%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a4%be-%e0%a4%ac/): एक नगर में सोमिलक नाम का जुलाहा रहता था । विविध प्रकार के रंगीन और सुन्दर वस्त्र बनाने के बाद भी उसे भोजन-वस्त्र मात्र से अधिक धन कभी प्राप्त नहीं होता था । अन्य जुलाहे मोटा-सादा कपड़ा बुनते हुए धनी हो गये थे । उन्हें देखकर एक दिन सोमलिक ने अपनी पत्नी से कहा—“प्रिये ! देखो, मामूली कपड़ा बुनने वाले जुलाहों ने भी कितना धन-वैभव संचित कर लिया है और मैं इतन सुन्दर, उत्कृष्ट वस्त्र बनाते हुए भी आज तक निर्धन ही हूँ । प्रतीत होता है यह स्थान मेरे लिये भाग्यशाली नहीं है; अतः विदेश जाकर धनोपार्जन करुँगा ।” ... - [पंचतंत्र की कहानी - व्यापारी के पुत्र की कहानी](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a4%be-2/): किसी नगर में सागर दत्त नाम का एक व्यापारी रहता था। उसके लड़के ने एक बार सौ रुपए में बिकने वाली एक पुस्तक खरीदी। उस पुस्तक में केवल एक श्लोक लिखा था – जो वस्तु जिसको मिलने वाली होती है, वह उसे अवश्य मिलती है। उस वस्तु की प्राप्ति को विधाता भी नहीं रोक सकता। अतएव मैं किसी वस्तु के विनष्ट हो जाने पर न दुखी होता हूं और न किसी वस्तु के अनायास मिल जाने पर आश्चर्य ही करता हूं। क्योंकि जो वस्तु दूसरों को मिलने वाली होगी, वह हमें नहीं मिल सकती और जो हमें मिलने वाली है, ... - [पंचतंत्र की कहानी - ब्राह्मणी और तिल के बीज](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a5%8d/): एक बार की बात है एक निर्धन ब्राह्मण परिवार रहता था, एक समय उनके यहाँ कुछ अतिथि आये, घर में खाने पीने का सारा सामान ख़त्म हो चुका था, इसी बात को लेकर ब्राह्मण और ब्राह्मण-पत्नी में यह बातचीत हो रही थी: ब्राह्मण—-“कल सुबह कर्क-संक्रान्ति है, भिक्षा के लिये मैं दूसरे गाँव जाऊँगा । वहाँ एक ब्राह्मण सूर्यदेव की तृप्ति के लिए कुछ दान करना चाहता है ।” पत्नी—“तुझे तो भोजन योग्य अन्न कमाना भी नहीं आता । तेरी पत्नी होकर मैंने कभी सुख नहीं भोगा, मिष्टान्न नहीं खाये, वस्त्र और आभूषणों को तो बात ही क्या कहनी ?” ब्राह्मण—-“देवी ... - [पंचतंत्र की कहानी - गजराज और मूषकराज](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a4%9c%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%94/): प्राचीन काल में एक नदी के किनारे बसा नगर व्यापार का केन्द्र था। फिर आए उस नगर के बुरे दिन, जब एक वर्ष भारी वर्षा हुई। नदी ने अपना रास्ता बदल दिया। लोगों के लिए पीने का पानी न रहा और देखते ही देखते नगर वीरान हो गया अब वह जगह केवल चूहों के लायक रह गई। चारों ओर चूहे ही चूहे नजर आने लगे। चूहो का पूरा साम्राज्य ही स्थापित हो गया। चूहों के उस साम्राज्य का राजा बना मूषकराज चूहा। चूहों का भाग्य देखो, उनके बसने के बाद नगर के बाहर जमीन से एक पानी का स्त्रोत फूट ... - [पंचतंत्र की कहानी - साधु और चूहा](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a5%81-%e0%a4%94%e0%a4%b0/): महिलरोपयम नामक एक दक्षिणी शहर के पास भगवान शिव का एक मंदिर था। वहां एक पवित्र ऋषि रहते थे और मंदिर की देखभाल करते थे। वे भिक्षा के लिए शहर में हर रोज जाते थे, और भोजन के लिए शाम को वापस आते थे। वे अपनी आवश्यकता से अधिक एकत्र कर लेते थे और बाकि का बर्तन में डाल कर गरीब मजदूरों में बाँट देते थे जो बदले में मंदिर की सफाई करते थे और उसे सजावट का काम किया करते थे। उसी आश्रम में एक चूहा भी अपने बिल में रहता था और हर रोज कटोरे में से कुछ ... - [पंचतंत्र की कहानी - मूर्ख मित्र](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%96-%e0%a4%ae/): किसी राजा के राजमहल में एक बन्दर सेवक के रुप में रहता था । वह राजा का बहुत विश्वास-पात्र और भक्त था । अन्तःपुर में भी वह बेरोक-टोक जा सकता था । एक दिन जब राजा सो रहा था और बन्दर पङखा झल रहा था तो बन्दर ने देखा, एक मक्खी बार-बार राजा की छाती पर बैठ जाती थी । पंखे से बार-बार हटाने पर भी वह मानती नहीं थी, उड़कर फिर वहीं बैठी जाती थी । बन्दर को क्रोध आ गया । उसने पंखा छोड़ कर हाथ में तलवार ले ली; और इस बार जब मक्खी राजा की छाती ... - [पंचतंत्र की कहानी - जैसे को तैसा](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%8b/): एक स्थान पर जीर्णधन नाम का बनिये का लड़का रहता था । धन की खोज में उसने परदेश जाने का विचार किया । उसके घर में विशेष सम्पत्ति तो थी नहीं, केवल एक मन भर भारी लोहे की तराजू थी । उसे एक महाजन के पास धरोहर रखकर वह विदेश चला गया । विदेश स वापिस आने के बाद उसने महाजन से अपनी धरोहर वापिस मांगी । महाजन ने कहा—-“वह लोहे की तराजू तो चूहों ने खा ली ।” बनिये का लड़का समझ गया कि वह उस तराजू को देना नहीं चाहता । किन्तु अब उपाय कोई नहीं था । ... - [पंचतंत्र की कहानी - मूर्ख बगुला और नेवला](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%96-%e0%a4%ac-2/): जंगल के एक बड़े वट-वृक्ष की खोल में बहुत से बगुले रहते थे । उसी वृक्ष की जड़ में एक साँप भी रहता था । वह बगलों के छोटे-छोटे बच्चों को खा जाता था । एक बगुला साँप द्वारा बार-बार बच्चों के खाये जाने पर बहुत दुःखी और विरक्त सा होकर नदी के किनारे आ बैठा । उसकी आँखों में आँसू भरे हुए थे । उसे इस प्रकार दुःखमग्न देखकर एक केकड़े ने पानी से निकल कर उसे कहा :-“मामा ! क्या बात है, आज रो क्यों रहे हो ?” बगुले ने कहा – “भैया ! बात यह है कि ... - [पंचतंत्र की कहानी - मित्र-द्रोह का फल](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%a6/): दो मित्र धर्मबुद्धि और पापबुद्धि हिम्मत नगर में रहते थे। एक बार पापबुद्धि के मन में एक विचार आया कि क्यों न मैं मित्र धर्मबुद्धि के साथ दूसरे देश जाकर धनोपार्जन कर्रूँ। बाद में किसी न किसी युक्ति से उसका सारा धन ठग-हड़प कर सुख-चैन से पूरी जिंदगी जीऊँगा। इसी नियति से पापबुद्धि ने धर्मबुद्धि को धन और ज्ञान प्राप्त होने का लोभ देते हुए अपने साथ बाहर जाने के लिए राजी कर लिया। शुभ-मुहूर्त देखकर दोनों मित्र एक अन्य शहर के लिए रवाना हुए। जाते समय अपने साथ बहुत सा माल लेकर गये तथा मुँह माँगे दामों पर बेचकर ... - [पंचतंत्र की कहानी - गौरैया और बन्दर](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a5%8c%e0%a4%b0%e0%a5%88%e0%a4%af%e0%a4%be/): किसी जंगल के एक घने वृक्ष की शाखाओं पर चिड़ा-चिडी़ का एक जोड़ा रहता था । अपने घोंसले में दोनों बड़े सुख से रहते थे । सर्दियों का मौसम था । एक दिन हेमन्त की ठंडी हवा चलने लगी और साथ में बूंदा-बांदी भी शुरु हो गई । उस समय एक बन्दर बर्फीली हवा और बरसात से ठिठुरता हुआ उस वृक्ष की शाखा पर आ बैठा। जाड़े के मारे उसके दांत कटकटा रहे थे । उसे देखकर चिड़िया ने कहा—-“अरे ! तुम कौन हो ? देखने में तो तुम्हारा चेहरा आदमियों का सा है; हाथ-पैर भी हैं तुम्हारे । फिर ... - [पंचतंत्र की कहानी - चिड़िया और बन्दर](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%bf%e0%a4%af/): एक जंगल में एक पेड़ पर गौरैया का घोंसला था। एक दिन कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। ठंड से कांपते हुए तीन चार बंदरो ने उसी पेड़ के नीचे आश्रय लिया। एक बंदर बोला “कहीं से आग तापने को मिले तो ठंड दूर हो सकती हैं।” दूसरे बंदर ने सुझाया “देखो, यहां कितनी सूखी पत्तियां गिरी पड़ी हैं। इन्हें इकट्ठा कर हम ढेर लगाते हैं और फिर उसे सुलगाने का उपाय सोचते हैं।” बंदरों ने सूखी पत्तियों का ढेर बनाया और फिर गोल दायरे में बैठकर सोचने लगे कि ढेर को कैसे सुलगाया जाए। तभी एक बंदर की नजर ... - [पंचतंत्र की कहानी - सिंह और सियार](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9-%e0%a4%94%e0%a4%b0/): वर्षों पहले हिमालय की किसी कन्दरा में एक बलिष्ठ शेर रहा करता था। एक दिन वह एक भैंसे का शिकार और भक्षण कर अपनी गुफा को लौट रहा था। तभी रास्ते में उसे एक मरियल-सा सियार मिला जिसने उसे लेटकर दण्डवत् प्रणाम किया। जब शेर ने उससे ऐसा करने का कारण पूछा तो उसने कहा, “सरकार मैं आपका सेवक बनना चाहता हूँ। कुपया मुझे आप अपनी शरण में ले लें। मैं आपकी सेवा करुँगा और आपके द्वारा छोड़े गये शिकार से अपना गुजर-बसर कर लूंगा।’ शेर ने उसकी बात मान ली और उसे मित्रवत अपनी शरण में रखा। कुछ ही ... - [पंचतंत्र की कहानी - हाथी और गौरैया](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a5%e0%a5%80-%e0%a4%94%e0%a4%b0/): किसी पेड़ पर एक गौरैया अपने पति के साथ रहती थी। वह अपने घोंसले में अंडों से चूजों के निकलने का बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी। एक दिन की बात है गौरैया अपने अंडों को से रही थी और उसका पति भी रोज की तरह खाने के इन्तेजाम के लिए बाहर गया हुआ था। तभी वहां एक गुस्सैल हाथी आया और आस-पास के पेड़ पौधों को रौंदते हुए तोड़-फोड़ करने लगा। उसी तोड़ फोड़ के दौरान वह गौरैया के पेड़ तक भी पहुंचा और उसने पेड़ को गिराने के लिए उसे जोर-जोर से हिलाया, पेड़ को काफी मजबूत था ... - [पंचतंत्र की कहानी - तीन मछलियां](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a4%9b%e0%a4%b2/): एक नदी के किनारे उसी नदी से जुड़ा एक बड़ा जलाशय था। जलाशय में पानी गहरा होता हैं, इसलिए उसमें काई तथा मछलियों का प्रिय भोजन जलीय सूक्ष्म पौधे उगते हैं। ऐसे स्थान मछलियों को बहुत रास आते हैं। उस जलाशय में भी नदी से बहुत-सी मछलियां आकर रहती थी। अंडे देने के लिए तो सभी मछलियां उस जलाशय में आती थी। वह जलाशय लम्बी घास व झाड़ियों द्वारा घिरा होने के कारण आसानी से नजर नहीं आता था। उसी में तीन मछलियों का झुंड रहता था। उनके स्वभाव भिन्न थे। अन्ना संकट आने के लक्षण मिलते ही संकट टालने ... - [पंचतंत्र की कहानी - मूर्ख बातूनी कछुआ](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%96-%e0%a4%ac/): किसी तालाब में कम्बुग्रीव नामक एक कछुआ रहता था। तालाब के किनारे रहने वाले संकट और विकट नामक हंस से उसकी गहरी दोस्ती थी। तालाब के किनारे तीनों हर रोज खूब बातें करते और शाम होने पर अपने-अपने घरों को चल देते। एक वर्ष उस प्रदेश में जरा भी बारिश नहीं हुई। धीरे-धीरे वह तालाब भी सूखने लगा। अब हंसों को कछुए की चिंता होने लगी। जब उन्होंने अपनी चिंता कछुए से कही तो कछुए ने उन्हें चिंता न करने को कहा। उसने हंसों को एक युक्ति बताई। उसने उनसे कहा कि सबसे पहले किसी पानी से लबालब तालाब की ... - [पंचतंत्र की कहानी - टिटिहरी का जोड़ा और समुद्र का अभिमान](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%b0/): समुद्रतट के एक भाग में एक टिटिहरी का जोडा़ रहता था । अंडे देने से पहले टिटिहरी ने अपने पति को किसी सुरक्षित प्रदेश की खोज करने के लिये कहा । टिटिहरे ने कहा – “यहां सभी स्थान पर्याप्त सुरक्षित हैं, तू चिन्ता न कर ।” टिटिहरी – “समुद्र में जब ज्वार आता है तो उसकी लहरें मतवाले हाथी को भी खींच कर ले जाती हैं, इसलिये हमें इन लहरों से दूर कोई स्थान देख रखना चाहिये ।” टिटिहरा – “समुद्र इतना दुःसाहसी नहीं है कि वह मेरी सन्तान को हानि पहुँचाये । वह मुझ से डरता है । इसलिये ... - [पंचतंत्र की कहानी - शेर, ऊंट, सियार और कौवा](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%8a%e0%a4%82%e0%a4%9f/): किसी वन में मदोत्कट नाम का सिंह निवास करता था। बाघ, कौआ और सियार, ये तीन उसके नौकर थे। एक दिन उन्होंने एक ऐसे उंट को देखा जो अपने गिरोह से भटककर उनकी ओर आ गया था। उसको देखकर सिंह कहने लगा, “अरे वाह! यह तो विचित्र जीव है। जाकर पता तो लगाओ कि यह वन्य प्राणी है अथवा कि ग्राम्य प्राणी” यह सुनकर कौआ बोला, “स्वामी! यह ऊंट नाम का जीव ग्राम्य-प्राणी है और आपका भोजन है। आप इसको मारकर खा जाइए।” सिंह बोला, “ मैं अपने यहां आने वाले अतिथि को नहीं मारता। कहा गया है कि विश्वस्त ... - [पंचतंत्र की कहानी - रंगा सियार](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%bf/): एक बार की बात है कि एक सियार जंगल में एक पुराने पेड़ के नीचे खड़ा था। पूरा पेड़ हवा के तेज झोंके से गिर पड़ा। सियार उसकी चपेट में आ गया और बुरी तरह घायल हो गया। वह किसी तरह घिसटता-घिसटता अपनी मांद तक पहुंचा। कई दिन बाद वह मांद से बाहर आया। उसे भूख लग रही थी। शरीर कमजोर हो गया था तभी उसे एक खरगोश नजर आया। उसे दबोचने के लिए वह झपटा। सियार कुछ दूर भाग कर हांफने लगा। उसके शरीर में जान ही कहां रह गई थी? फिर उसने एक बटेर का पीछा करने की ... - [पंचतंत्र की कहानी - खटमल और बेचारी जूं](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%96%e0%a4%9f%e0%a4%ae%e0%a4%b2-%e0%a4%94%e0%a4%b0/): एक राजा के शयनकक्ष में मंदरीसर्पिणी नाम की जूं ने डेरा डाल रखा था। रोज रात को जब राजा जाता तो वह चुपके से बाहर निकलती और राजा का खून चूसकर फिर अपने स्थान पर जा छिपती। संयोग से एक दिन अग्निमुख नाम का एक खटमल भी राजा के शयनकक्ष में आ पहुंचा। जूं ने जब उसे देखा तो वहां से चले जाने को कहा। उसने अपने अधिकार-क्षेत्र में किसी अन्य का दखल सहन नहीं था। लेकिन खटमल भी कम चतुर न था, बोलो, ‘‘देखो, मेहमान से इसी तरह बर्ताव नहीं किया जाता, मैं आज रात तुम्हारा मेहमान हूं।’’ जूं ... - [पंचतंत्र की कहानी - चतुर खरगोश और शेर](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%96%e0%a4%b0/): किसी घने वन में एक बहुत बड़ा शेर रहता था। वह रोज शिकार पर निकलता और एक ही नहीं, दो नहीं कई-कई जानवरों का काम तमाम देता। जंगल के जानवर डरने लगे कि अगर शेर इसी तरह शिकार करता रहा तो एक दिन ऐसा आयेगा कि जंगल में कोई भी जानवर नहीं बचेगा। सारे जंगल में सनसनी फैल गई। शेर को रोकने के लिये कोई न कोई उपाय करना ज़रूरी था। एक दिन जंगल के सारे जानवर इकट्ठा हुए और इस प्रश्न पर विचार करने लगे। अन्त में उन्होंने तय किया कि वे सब शेर के पास जाकर उनसे इस ... - [पंचतंत्र की कहानी - बगुला भगत और केकड़ा](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%ad/): एक वन प्रदेश में एक बहुत बड़ा तालाब था। हर प्रकार के जीवों के लिए उसमें भोजन सामग्री होने के कारण वहां नाना प्रकार के जीव, पक्षी, मछलियां, कछुए और केकड़े निवास करते थे। पास में ही बगुला रहता था, जिसे परिश्रम करना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। उसकी आंखें भी कमजोर थीं। मछलियां पकडने के लिए तो मेहनत करनी पड़ती हैं, जो उसे खलती थी। इसलिए आलस्य के मारे वह प्रायः भूखा ही रहता। एक टांग पर खड़ा यही सोचता रहता कि क्या उपाय किया जाए कि बिना हाथ-पैर हिलाए रोज भोजन मिले। एक दिन उसे एक उपाय सूझा ... - [पंचतंत्र की कहानी - लड़ते बकरे और सियार](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b2%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%ac/): एक दिन एक सियार किसी गाँव से गुजर रहा था। उसने गाँव के बाजार के पास लोगों की एक भीड़ देखी। कौतूहलवश वह सियार भीड़ के पास यह देखने गया कि क्या हो रहा है। सियार ने वहां देखा कि दो बकरे आपस में लड़ाई कर रहे थे। दोनों ही बकरे काफी तगड़े थे इसलिए उनमे जबरदस्त लड़ाई हो रही थी। सभी लोग जोर-जोर से चिल्ला रहे थे और तालियां बजा रहे थे। दोनों बकरे बुरी तरह से लहूलुहान हो चुके थे और सड़क पर भी खून बह रहा था। जब सियार ने इतना सारा ताजा खून देखा तो अपने ... - [पंचतंत्र की कहानी - मूर्ख साधू और ठग](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%96-%e0%a4%b8/): एक बार की बात है, किसी गाँव के मंदिर में देव शर्मा नाम का एक प्रतिष्ठित साधू रहता था। गांव में सभी लोग उनका सम्मान करते थे। उसे अपने भक्तों से दान में तरह- तरह के वस्त्र, उपहार, खाद्य सामग्री और पैसे मिलते थे। उन वस्त्रों को बेचकर साधू ने काफी धन जमा कर लिया था। साधू कभी किसी पर विश्वास नहीं करता था और हमेशा अपने धन की सुरक्षा के लिए चिंतित रहता था। वह अपने धन को एक पोटली में रखता था और उसे हमेशा अपने साथ लेकर ही चलता था। उसी गाँव में एक ठग रहता था। ... - [पंचतंत्र की कहानी - व्यापारी का पतन और उदय](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a4%be/): वर्धमान नामक शहर में एक बहुत ही कुशल व्यापारी दंतिल रहता था। राजा को उसकी क्षमताओं के बारे में पता था जिसके चलते राजा ने उसे राज्य का प्रशासक बना दिया। अपने कुशल तरीकों से व्यापारी दंतिल ने राजा और आम आदमी को बहुत खुश रखा। कुछ समय के बाद व्यापारी दंतिल ने अपनी लड़की का विवाह तय किया। इस उपलक्ष्य में उसने एक बहुत बड़े भोज का आयोजन किया। इस भोज में उसने राज परिवार से लेकर प्रजा तक सभी को आमंत्रित किया। राजघराने का एक सेवक, जो महल में झाड़ू लगाता था, वह भी इस भोज में शामिल ... - [पंचतंत्र की कहानी - सियार और ढोल](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%94/): एक बार एक जंगल के निकट दो राजाओं के बीच घोर युद्ध हुआ। एक जीता दूसरा हारा। सेनाएं अपने नगरों को लौट गईं। बस, सेना का एक ढोल पीछे रह गया। उस ढोल को बजा-बजाकर सेना के साथ गए भाट व चारण रात को वीरता की कहानियां सुनाते थे। युद्ध के बाद एक दिन आंधी आई। आंधी के जोर में वह ढोल लुढ़कता-पुढ़कता एक सूखे पेड़ के पास जाकर टिक गया। उस पेड़ की सूखी टहनियां ढोल से इस तरह से सट गई थीं कि तेज हवा चलते ही ढोल पर टकरा जाती थीं और ढमाढम-ढमाढम की गुंजायमान आवाज होती। ... - [पंचतंत्र की कहानी - बन्दर और लकड़ी का खूंटा](https://sahityalaya.com/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%b0-%e0%a4%94/): एक समय शहर से कुछ ही दूरी पर एक मंदिर का निर्माण किया जा रहा था। मंदिर में लकड़ी का काम बहुत था इसलिए लकड़ी चीरने वाले बहुत से मज़दूर काम पर लगे हुए थे। यहां-वहां लकड़ी के लठ्टे पडे हुए थे और लठ्टे व शहतीर चीरने का काम चल रहा था। सारे मज़दूरों को दोपहर का भोजन करने के लिए शहर जाना पड़ता था, इसलिए दोपहर के समय एक घंटे तक वहां कोई नहीं होता था। एक दिन खाने का समय हुआ तो सारे मज़दूर काम छोड़कर चल दिए। एक लठ्टा आधा चिरा रह गया था। आधे चिरे लठ्टे ... - [शेखचिल्ली की कहानी - शेखचिल्ली और सात परियां](https://sahityalaya.com/%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%9a%e0%a4%bf-3/): शेख चिल्ली बहुत ही गरीब परिवार से था। वह पढ़ाई-लिखाई में भी बहुत कमजोर था। अगर वो किसी चीज में माहिर था, तो वो था दिन भर बस खेल-खूद करना। अपना सारा समय वह मोहल्ले के लड़कों के साथ कंचे खेलने में बिता देता था। इसी तरह उसका पूरा बचपन बीत गया। धीरे-धीरे वह बड़ा होता चला गया लेकिन उसकी आदतें नहीं बदली। शेख चिल्ली की इस आदत से उसकी मां बहुत परेशान थी। वह चाहती थी शेख चिल्ली अब बड़ा हो गया है, तो उसे कुछ काम-धंधा करना चाहिए, ताकि घर की हालत सुधर सके। एक दिन उसने शेख ... - [अकबर-बीरबल की कहानी : तीन प्रश्न](https://sahityalaya.com/%e0%a4%85%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%ac%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d/): अकबर और बीरबल के किस्से काफी प्रसिद्ध हैं। बीरबर मुग़ल सम्राट अकबर एक मंत्री थे। बीरबल अपनी चतुराई और बुद्धिमता से अकबर की सभी समस्या चुटकी बजाते ही हल कर देते थे और इसी वजह से बीरबल अकबर के सबसे ज्यादा विश्वास पात्र भी थे। लेकिन बीरबल की प्रशंसा अकबर के बाकि सभी मंत्रियों को बिल्कुल भी पसंद ना आती। एक बार अकबर ने किसी बात पर बीरबल की भरे दरबार में जमकर तारीफ की। इस पर सारे दरबारी बीरबल से मन ही मन बड़े गुस्सा हुए। अब वो सभी अकबर से बोले कि महाराज आप बीरबल की कुछ ज्यादा ... - [अकबर-बीरबल की कहानी : कटहल का पेड़](https://sahityalaya.com/%e0%a4%85%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%ac%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%9f%e0%a4%b9%e0%a4%b2-%e0%a4%95/): बीरबल अपना ज्यादातर समय शहंशाह अकबर के शाही बागों में बिताया करते थे| अकबर के शाही बाग़ में कई प्रकार के सुन्दर वृक्ष और सुन्दर दिखने वाले फूल थे| उस बाग़ की देखभाल के लिए मीर नाम का एक माली रखा हुआ था| बीरबल अक्सर मीर के पास बैठकर पेड़ों और पौधों के बारे में बातें किया करते थे| इस तरह मीर और बीरबल के बीच अच्छी दोस्ती हो गयी थी| एक सुबह जब बीरबल बाग़ में टहलने गए तो देखा मीर बुरी तरह रो रहा था| बीरबल ने उसके रोने का कारण पूछा तो मीर ने बताया कि उसने ... - [अकबर-बीरबल की कहानी : दुष्ट नाई की दुर्दशा](https://sahityalaya.com/%e0%a4%85%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%ac%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f/): सम्राट अकबर बीरबल को सबसे अधिक महत्व देते थे। बीरबल की प्रशंसा को देखकर सारे दरबारी उनसे जल भून जाते थे। सभी मंत्री नए नए तरीकों से बीरबल को नीचा दिखाने की कोशिश करते थे लेकिन बीरबल बड़े ही चतुर एवं बुद्धिमान थे। एक बार कुछ मंत्रियों ने मिलकर बीरबल से हमेशा के लिए छुटकारा पाने की एक तरकीब निकाली। सभी मंत्री अकबर से नाई के पास गए और उसको बीरबल को मारने की एक योजना बताई और बदले में बहुत सारा धन देने की बात कही। वो नाइ अकबर का सबसे करीबी इंसान था। अकबर ने जब नाई को ... - [शेखचिल्ली की कहानी - तेंदुए का शिकार](https://sahityalaya.com/%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%81/): शेख चिल्ली का भाग्य जागा! झज्जर के नवाब ने शेख चिल्ली को नौकरी पर रख लिया था। शेख चिल्ली अब समाज का एक गणमान्य व्यक्ति था। एक दिन नवाब साहब शिकार के लिए जा रहे थे। शेख चिल्ली ने भी साथ आने की विनती की। ”अरे मियां तुम घने जंगलों में क्या करोगे?” नवाब ने पूछा। ”जंगल कोई दिन में सपने देखने की जगह थोड़े ही है! क्या तुमने कभी किसी चूहे का शिकार किया है जो तुम अब तेंदुए का शिकार करोगे?” ”सरकार आप मुझे बस एक मौका दीजिए अपनी कुशलता दिखाने का” शेख चिल्ली ने बड़े अदब के ... - [शेखचिल्ली की कहानी - सबसे झूठा कौन ?](https://sahityalaya.com/%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%ac%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%9d/): झज्जर के नवाब युद्ध लड़ने के लिए कई महीनों से बाहर गए थे। उनकी अनुपस्थिति में उनके छोटे भाई – छोटे नवाब ही राज-पाट का सारा काम संभालते थे। नवाब साहब धीरे- धीरे करके शेख चिल्ली को चाहने लगे थे। उन्हें उसकी सरलता में आनंद आता था। परंतु छोटे नवाब शेख चिल्ली को पूरी तरह बेवकूफ और कामचोर मानते थे। एक दिन उन्होंने भरी सभा में शेख चिल्ली को डांटा और उसका अपमान किया। ”एक अच्छा आदमी बताए हुए काम से भी कहीं ज्यादा काम करता है और एक तुम हो जो सरल से काम को भी ठीक ढंग से ... - [शेखचिल्ली की कहानी - खयाली पुलाव](https://sahityalaya.com/%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%96%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80/): एक दिन सुबह-सुबह मियां शेख चिल्ली बाज़ार पहुँच गए। बाज़ार से उन्होने अंडे खरीदे और उन अंडों को एक टोकरी नें भर कर अपने सिर पर रख लिया, फिर वह घर की ओर जाने लगे। घर जाते-जाते उन्हे खयाल आया कि अगर इन अंडों से बच्चे निकलें तो मेरे पास ढेर सारी मुर्गियाँ होंगी। वह सब मुर्गियाँ ढेर सारे अंडे देंगी। उन अंडों को बाज़ार में बेच कर मैं धनवान बन जाऊंगा। अमीर बन जाने के बाद मै एक नौकर रखूँगा जो मेरे लिए खरीदारी करेगा। उसके बाद मैं अपनें लिए एक महल जैसा आलीशान घर बनवाऊंगा। उस बड़े से ... - [शेखचिल्ली की कहानी - शेखचिल्ली और कुएं की परियां](https://sahityalaya.com/%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%9a%e0%a4%bf-2/): एक गांव में एक सुस्त और कामचोर आदमी रहता था। काम – धाम तो वह कोई करता न था, हां बातें बनाने में बड़ा माहिर था। इसलिए लोग उसे शेखचिल्ली कहकर पुकारते थे। शेखचिल्ली के घर की हालत इतनी खराब थी कि महीने में बीस दिन चूल्हा नहीं जल पाता था। शेखचिल्ली की बेवकूफी और सुस्ती की सजा उसकी बीवी को भी भुगतनी पड़ती और भूखे रहना पड़ता। एक दिन शेखचिल्ली की बीवी को बड़ा गुस्सा आया। वह बहुत बिगड़ी और कहा,”अब मैं तुम्हारी कोई भी बात नहीं सुनना चाहती। चाहे जो कुछ करो, लेकिन मुझे तो पैसा चाहिए। जब ... - [शेखचिल्ली की कहानी - शेखचिल्ली की खीर](https://sahityalaya.com/%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%9a%e0%a4%bf/): शेखचिल्ली पूरा बेवक़ूफ़ था और हमेशा बेवकूफी भरी बातें ही करता था। शेख चिल्ली की माँ उसकी बेवकूफी भरी बातों से बहुत परेशान रहती थी। एक बार शेखचिल्ली ने अपनी माँ से पूछा कि माँ लोग मरते कैसे हैं? अब माँ सोचने लगी कि इस बेवक़ूफ़ को कैसे समझाया जाए कि लोग कैसे मरते हैं, माँ ने कहा कि बस आँखें बंद हो जाती हैं और लोग मर जाते हैं। शेखचिल्ली ने सोचा कि उसे एक बार मर कर देखना चाहिए। उसने गाँव के बाहर जाकर एक गड्ढा खोदा और उसमें आँखें बंद करके लेट गया। रात होने पर उस ... - [शेखचिल्ली की कहानी - कैसे नाम पड़ा शेखचिल्ली ?](https://sahityalaya.com/%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%a8/): शेखचिल्ली के बारे में यही कहा जाता है कि उसका जन्म किसी गांव में एक गरीब शेख परिवार में हुआ था। पिता बचपन में ही गुजर गए थे, मां ने पाल-पोस कर बड़ा किया। मां सोचती थी कि एक दिन बेटा बड़ा होकर कमाएगा तो गरीबी दूर होगी। उसने बेटे को पढ़ने के लिए मदरसे में दाखिला दिला दिया। सब बच्चे उसे ‘शेख’ कहा करते थे। मौलवी साहब ने पढ़ाया, लड़का है तो ‘खाता’ है और लड़की है तो ‘खाती’ है । जैसे रहमान जा रहा है, रजिया जा रही है। एक दिन एक लड़की कुएं में गिर पड़ी। वह ... - [तेनालीराम की कहानी - रंग-बिरंगी मिठाइयां](https://sahityalaya.com/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%ac%e0%a4%bf/): वसंत ऋतु छाई हुई थी। राजा कृष्णदेव राय बहुत ही खुश थे। वह तेनालीराम के साथ बाग में टहल रहे थे। वह चाह रहे थे कि एक ऐसा उत्सव मनाया जाए, जिसमें उनके राज्य के सारे लोग शामिल हों। पूरा राज्य उत्सव के आनंद में डूब जाए। इस विषय में वह तेनालीराम से भी राय लेना चाहते थे। तेनालीराम ने राजा की इस सोच की प्रशंसा की और इसके बाद राजा ने विजयनगर में राष्ट्रीय उत्सव मनाने का आदेश दे दिया। शीघ्र ही नगर को स्वच्छ करवा दिया गया, सड़कों व इमारतों में रोशनी की व्यवस्था कराई गई। पूरे नगर ... - [तेनालीराम की कहानी - मृत्युदंड की धमकी](https://sahityalaya.com/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/): थट्टाचारी कृष्णदेव राय के दरबार में राजगुरु थे। वे तेनालीराम से बहुत ईर्ष्या करते थे। उन्हें जब भी मौका मिलता तो वे तेनालीराम के विरुद्ध राजा के कान भरने से नहीं चूकते थे। एक बार क्रोध में आकर राजा ने तेनालीराम को मृत्युदंड देने की घोषणा कर दी, परंतु अपनी विलक्षण बुद्धि और हाजिरजवाबी से तेनालीराम ने जीवन की रक्षा की। एक बार तेनालीराम ने राजा द्वारा दी जाने वाली मृत्युदंड की धमकी को हमेशा के लिए समाप्त करने की योजना बनाई। वे थट्टाचारी के पास गए और बोले, ‘महाशय, एक सुंदर नर्तकी शहर में आई है। वह आपके समान ... - [तेनालीराम की कहानी - नली का कमाल](https://sahityalaya.com/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be/): राजा कृष्णदेव राय का दरबार लगा हुआ था। महाराज अपने दरबारियों के साथ किसी चर्चा में व्यस्त थे। अचानक से चतुर और चतुराई पर चर्चा चल पड़ी। महाराज कृष्णदेव के दरबार में दरबारियों से लेकर राजगुरु तक तेनालीराम से चिढ़ते थे। तेनालीराम को नीचा दिखाने के उद्देश्य से एक मंत्री ने खड़े होकर कहा – महाराज! आपके इस दरबार मे बुद्धिमान और चतुर लोगो की कमी नहीं। यदि अवसर दिया जाए तो हम भी अपनी बुद्धिमानी सिद्ध कर सकते हैं किंतु? “किन्तु क्या मंत्री जी”, महाराज कृष्णदेव ने आश्चर्य से पूछा। सेनापति अपने स्थान से उठकर बोला – मैं बताता ... - [तेनालीराम की कहानी - दूध न पीने वाली बिल्ली](https://sahityalaya.com/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%82%e0%a4%a7-%e0%a4%a8-%e0%a4%aa/): एक बार महाराज कृष्णदेव राय ने सुना कि उनके नगर में चूहों ने आतंक फैला रखा है। चूहों से छुटकारा पाने के लिए महाराज ने एक हजार बिल्लियां पालने का निर्णय लिया। महाराज का आदेश होते ही एक हजार बिल्लियां मंगवाई गयी। उन बिल्लियों को नगर के लोगों में बांटा जाना था। जिसे बिल्ली दी गयी उसे साथ में एक गाय भी दी गयी ताकि उसका दूध पिलाकर बिल्ली को पाला जा सके। चूहों से सभी लोग परेशान थे, अतः जब बिल्लियाँ बंट रही थी तो लोगों की लंबी-लंबी कतारें लग गयी थीं। इस अवसर पर तेनालीरामन भी एक कतार ... - [तेनालीराम की कहानी - बूढ़ा भिखारी और महाराज कृष्णदेवराय की उदारता](https://sahityalaya.com/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a5%82%e0%a4%a2%e0%a4%bc%e0%a4%be/): सर्दियों का मौसम था। महाराज कृष्णदेव अपने कुछ मंत्रियों के साथ किसी काम से नगर से बाहर जा रहे थे। ठंड इतनी थी कि सभी दरबारी मोटे-मोटे ऊनी वस्त्र पहनने के बाद भी काँप रहे थे। चलते-चलते राजा की दृष्टि एक बूढ़े भिखारी पर पड़ी जो हाथ में कटोरा लिए इस कड़कड़ाती ठंड में एक पत्थर पर बैठा काँप रहा था। भिखारी की ऐसी स्थिति देखकर महाराज से रहा न गया। रथ रूकवाकर पहुँच गए उस स्थान पर जहाँ वह बूढ़ा भीख मांग रहा था। कुछ देर तक राजा कृष्ण देव भिखारी को देखते रहे और फिर अपना कीमती शॉल ... - [तेनालीराम की कहानी - तेनालीराम की मनपसन्द मिठाई](https://sahityalaya.com/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2-3/): महाराज, राजपुरोहित और तेनालीराम राज उद्यान में टहल रहे थे कि महाराज बोले , “ऐसी सर्दी में तो खूब खाओ और सेहत बनाओ। वैसे भी इस बार तो कड़के की ठण्ड पड़ रही है। ऐसे में तो मिठाई खाने का मज़ा ही कुछ और है।” जैसे ही खाने पीने की बात शुरू हुई तो राजपुरोहित के मुंह में पानी आ गया और वह बोला, “महाराज ऐसे में तो मावे की मिठाई खाने में बड़ा ही आनंद आता है।” “सर्दियों की सबसे बढ़िया मिठाई कौन सी है ?”महाराज ने अचानक से पूछा तेनालीराम से पहले पुरोहित बोला, “ महाराज एक हो ... - [तेनालीराम की कहानी - सात जूते मारने वाली चमेली](https://sahityalaya.com/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%9c%e0%a5%82/): चाननपुर गाँव में चांदकुमारी नाम की एक रूपवती कन्या रहती थी। वह विवाह के योग्य हो गई थी लेकिन अपनी माँ के व्यवहार के कारण उसका विवाह नहीं हो पा रहा था।उसकी माँ का नाम चमेली था जो अपने पति माधो को रोज़ सात जूते मारा करती थी।यह बात दूर – दूर तक के लोगों को पता थी इसलिए कोई भी चांदकुमारी को अपनी बहु नहीं बनाना चाहता था। वहीँ दूसरी तरफ तेनालीराम की बुद्धिमत्ता के कारण दरबारियों के साथ – साथ उसके कुछ रिश्तेदार भी उससे जलते थे।एक बार तेनालीराम घर पर आराम फरमा रहा था कि अचानक उसका ... - [तेनालीराम की कहानी - तेनालीराम मटके में](https://sahityalaya.com/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2-2/): एक बार महाराज कृष्णदेव राय तेनालीराम से इतने नाराज़ हो गए कि उन्होंने उसे अपनी शक्ल न दिखाने का आदेश दे दिया और कहा ,“ अगर उसने उनके हुक्म की अवहेलना की तो उसे कोड़े लगायें जाएंगे।” महाराज उस समय बहुत क्रोधित थे इसलिए तेनालीराम ने वहाँ से जाना ही उचित समझा । अगले दिन जब महाराज राजदरबार की ओर आ रहे थे तो तेनालीराम से चिढ़ने वाला एक दरबारी महाराज को तेनालीराम के खिलाफ भड़काता जा रहा था।वह महाराज से बोला, “आज तो तेनालीराम ने आपके आदेश की अवहेलना की है । आपके मना करने के बावजूद भी वह ... - [तेनालीराम की कहानी - तेनालीराम की खोज](https://sahityalaya.com/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2/): एक बार तेनालीराम महाराज से किसी बात पर रूठा हुआ था कि महाराज कृष्णदेवराय ने उसे फिर से किसी बात पर डांट दिया। जिसकी वजह से तेनालीराम बिना बताएं वहाँ से कहीं चला गया और दरबार में आना बंद कर दिया। महाराज को लगा एक दो दिन बाद खुद ही आ जायेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ सप्ताह बीत गया तेनालीराम दरबार में नहीं आया। जब महाराज को तेनालीराम की कमी खलने लगी तो उन्होंने एक सेवक को तेनालीराम के घर भेज दिया। वहाँ जाकर पता चला कि तेनालीराम बहुत दिनों से घर भी नहीं आया है। अब महाराज परेशान हो ... - [तेनालीराम की कहानी - रिश्वत का खेल](https://sahityalaya.com/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5/): कृष्णदेव राय कला प्रेमी थे इसीलिए कलाकारों का प्रोत्साहन बढ़ाने के लिए उनके अच्छे प्रदर्शन के लिए उन्हें पुरस्कार देकर सम्मानित करते रहते थे। कलाकारों को सम्मानित करने से पहले वे एक बार तेनालीराम से जरुर पूछते थे। महाराज की ये बात तेनालीराम के विरोधियों को बहुत खलती थी। तेनालीराम कुछ दिनों से राजदरबार में नहीं आ रहा था जिसका फायदा उठाते हुए उसके विरोधियों ने महाराज के कान भरने शुरू कर दिए।उनमे से एक विरोधी महाराज से बोला, “महाराज तेनालीराम रिश्वतखोर है।” दूसरा बोला, “महाराज वह जिसको जितना बड़ा पुरस्कार दिलवाता है उससे उतनी ही बड़ी रिश्वत लेता है।” ... - [तेनालीराम की कहानी - राजगुरू की चाल](https://sahityalaya.com/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%97%e0%a5%81/): तेनालीरामन की ईमानदारी का पुरस्कार तेनालीराम से चिढ़ने वाले कुछ ब्राह्मण एक दिन राजगुरु के पास पहुंचे। क्योंकि वे सभी अच्छी तरह जानते थे कि राजगुरु तेनालीराम का पक्का विरोधी है और तेनाली से बदला लेने में वो उनकी मदद जरूर करेंगे। राजगुरु और ब्राह्मणों ने मिलकर सोचा क्यों न तेनालीराम को अपना शिष्य बनाने का बहाना किया जाएं। शिष्य बनाने के नियमानुसार तेनालीराम के शरीर को दागा जाएगा और इस प्रकार हमारा बदला भी पूरा हो जाएगा। फिर राजगुरु उसे निम्न कोटि का ब्राह्मण बताकर अपना शिष्य बनाने से इंकार कर देंगे। अगले ही दिन राजगुरु ने तेनालीराम को ... - [तेनालीराम की कहानी - मनहूस कौन ?](https://sahityalaya.com/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%82%e0%a4%b8/): एक बार महाराज के कानों तक चेलाराम के एक व्यक्ति के बारे में खबर पहुंची। सब लोग बोलते थे कि जो कोई भी चेलाराम का मुंह देख लेता है उसे पूरे दिन एक निवाला तक खाने को नहीं मिलता।वह इंसान पूरे दिन भूखा ही रह जाता था। यह बात परखने के लिए महाराज ने उसे अपने सामने वाले कक्ष में ठहरने के लिए बुलवा लिया।चेलाराम महल में आकर बहुत खुश था।उसे राजसी भोग भोगने में बड़ा ही मज़ा आ रहा था। एक दिन महाराज की नींद अचानक से खुल गई। उन्होंने अपने कक्ष के बाहर देखा तो उनकी नज़र सामने ... - [तेनालीराम की कहानी - नीलकेतु और तेनालीराम](https://sahityalaya.com/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%b2%e0%a4%95%e0%a5%87/): एक बार राज दरबार में नीलकेतु नाम का यात्री राजा कृष्णदेव राय से मिलने आया। पहरेदारों ने राजा को उसके आने की सूचना दी। राजा ने नीलकेतु को मिलने की अनुमति दे दी। यात्री एकदम दुबला-पतला था। वह राजा के सामने आया और बोला- महाराज, मैं नीलदेश का नीलकेतु हूं और इस समय मैं विश्व भ्रमण की यात्रा पर निकला हूं। सभी जगहों का भ्रमण करने के पश्चात आपके दरबार में पहुंचा हूं। राजा ने उसका स्वागत करते हुए उसे शाही अतिथि घोषित किया। राजा से मिले सम्मान से खुश होकर वह बोला- महाराज! मैं उस जगह को जानता हूं, ... - [तेनालीराम की कहानी - मौत की सजा](https://sahityalaya.com/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%8c%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%80/): बीजापुर के सुल्तान इस्माइल आदिलशाह को डर था कि राजा कृष्णदेव राय अपने प्रदेश रायचूर और मदकल को वापस लेने के लिए हम पर हमला करेंगे। उसने सुन रखा था कि वैसे राजा ने अपनी वीरता से कोडीवडु, कोंडपल्ली, उदयगिरि, श्रीरंगपत्तिनम, उमत्तूर और शिवसमुद्रम को जीत लिया था। सुलतान ने सोचा कि इन दो नगरों को बचाने का एक ही उपाय है कि राजा कृष्णदेव राय की हत्या करवा दी जाए। उसने बड़े इनाम का लालच देकर तेनालीराम के पुराने सहपाठी और उसके मामा के संबंधी कनकराजू को इस काम के लिए राजी कर लिया। कनकराजू तेनालीराम के घर पहुंचा। ... - [तेनालीराम की कहानी - बेशकीमती फूलदान](https://sahityalaya.com/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%80/): विजयनगर का वार्षिक उत्सव बहुत ही धूमधाम से बनाया जाता था। जिसमें आसपास के राज्यों के राजा भी महाराज के लिए बेशकीमती उपहार लेकर सम्मिलित होते थे। हर बार की तरह इस बार भी महाराज को बहुत से उपहार मिले। सारे उपहार में महाराज को रत्नजड़ित रंग – बिरंगे चार फूलदान बहुत ही पसंद आए। महाराज ने उन फूलदानों को अपने विशेष कक्ष में रखवाया और उन फूलदानों की रखवाली के लिए एक सेवक भी रख लिया। सेवक रमैया बहुत ही ध्यान से उन फूलदानों की रखवाली करता था क्योंकि उसे ये काम सौंपने से पहले ही बता दिया गया ... - [तेनालीराम की कहानी - बाबापुर की रामलीला](https://sahityalaya.com/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%aa/): हर वर्ष दशहरे से पूर्व काशी की नाटक मंडली विजयनगर आती थी। सामान्यतः वे राजा कृष्णदेव राय तथा विजयनगर की प्रजा के लिए रामलीला किया करते थे। परंतु एक बार राजा को सूचना मिली कि नाटक मंडली विजयनगर नहीं आ रही है। इसका कारण यह था कि नाटक मंडली के कई सदस्य बीमार हो गए थे। यह सूचना पाकर राजा बहुत दुःखी हुए, क्योंकि दशहरे में अब कुछ ही दिन बाकी थे। इतने कम दिनों में दूसरी नाटक मंडली की भी व्यवस्था नहीं की जा सकती थी। पास में दूसरी कोई नाटक मंडली नहीं होने के कारण इस वर्ष रामलीला ... - [तेनालीराम की कहानी - कुछ नहीं](https://sahityalaya.com/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%9b-%e0%a4%a8%e0%a4%b9/): तेनालीराम राजा कृष्ण देव राय के निकट होने के कारण बहुत से लोग उनसे जलते थे। उनमे से एक था रघु नाम का ईर्ष्यालु फल व्यापारी। उसने एक बार तेनालीराम को षड्यंत्र में फसाने की युक्ति बनाई। उसने तेनालीराम को फल खरीदने के लिए बुलाया। जब तेनालीराम ने उनका दाम पूछा तो रघु मुस्कुराते हुए बोला, “आपके लिए तो इनका दाम ‘कुछ नहीं’ है।” यह बात सुन कर तेनालीराम ने कुछ फल खाए और बाकी थैले में भर आगे बढ़ने लगे। तभी रघु ने उन्हें रोका और कहा कि मेरे फल के दाम तो देते जाओ। तेनालीराम रघु के इस ... - [तेनालीराम की कहानी - जादूगर का घमंड](https://sahityalaya.com/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%82%e0%a4%97/): एक बार राजा कृष्ण देव राय के दरबार में एक जादूगर आया। उसने बहुत देर तक हैरतअंगेज़ जादू करतब दिखा कर पूरे दरबार का मनोरंजन किया। फिर जाते समय राजा से ढेर सारे उपहार ले कर अपनी कला के घमंड में सबको चुनौती दे डाली- क्या कोई व्यक्ति मेरे जैसे अद्भुत करतब दिखा सकता है। क्या कोई मुझे यहाँ टक्कर दे सकता है? इस खुली चुनौती को सुन कर सारे दरबारी चुप हो गए। परंतु तेनालीराम को इस जादूगर का यह अभिमान अच्छा नहीं लगा। वह तुरंत उठ खड़े हुए और बोले कि हाँ मैं तुम्हे चुनौती देता हूँ कि ... - [तेनालीराम की कहानी - अंगूठी चोर](https://sahityalaya.com/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%82%e0%a4%a0/): महाराजा कृष्ण देव राय एक कीमती रत्न जड़ित अंगूठी पहना करते थे। जब भी वह दरबार में उपस्थित होते तो अक्सर उनकी नज़र अपनी सुंदर अंगूठी पर जाकर टिक जाती थी। राजमहल में आने वाले मेहमानों और मंत्रीगणों से भी वह बार-बार अपनी उस अंगूठी का ज़िक्र किया करते थे। एक बार राजा कृष्ण देव राय उदास हो कर अपने सिंहासन पर बैठे थे। तभी तेनालीराम वहाँ आ पहुंचे। उन्होने राजा की उदासी का कारण पूछा। तब राजा ने बताया कि उनकी पसंदीदा अंगूठी खो गयी है, और उन्हे पक्का शक है कि उसे उनके बारह अंग रक्षकों में से ... - [तेनालीराम की कहानी - पड़ोसी राजा](https://sahityalaya.com/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%8b%e0%a4%b8/): विजयनगर राज्य का अपने पड़ोसी राज्य से मनमुटाव चल रहा था। तेनाली राम के विरोधियों को तेनाली राम के खिलाफ राजा कृष्णदेव राय को भड़काने का यह बड़ा ही सुन्दर अवसर जान पड़ा। एक दिन राजा कृष्णदेव राय अपने बगीचे में अकेले बैठे पड़ोसी राज्य की समस्या के बारे में ही सोच रहे थे कि तभी एक दरबारी उनके पास पहुंचा और बड़ी होशियारी से इधर उधर झांकता हुआ राजा के कान के पास मुंह ले जाकर बोला, ‘‘महाराज, कुछ सुना आपने ?’’ ‘‘नहीं तो..क्या हुआ ?’’ राजा चौंके। ‘‘महाराज, क्षमा करें। पहले जान बख्श देने का वचन दें तो ... - [तेनालीराम की कहानी - महामूर्ख](https://sahityalaya.com/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%82/): राजा कृष्णदेव राय होली का उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाते थे। होली के दिन मनोविनोद के अनेक कार्यक्रम विजयनगर में होते थे। प्रत्येक कार्यक्रम के सफल कलाकार को पुरस्कार देने की व्यवस्था भी होती थी। सबसे बड़ा तथा सबसे मूल्यवान पुरस्कार ‘महामूर्ख’ की उपाधि पाने वाले को दिया जाता था। तेनाली राम को हर साल सर्वश्रेष्ठ हास्य कलाकार का पुरस्कार तो मिलता ही था। अपनी चतुराई और बुद्धिमानी के बल पर प्रतिवर्ष ‘महामूर्ख’ भी वही चुना जाता था। इस तरह तेनाली राम हर वर्ष दो-दो पुरस्कार अकेले हड़प लेता था। इसी कारण अन्य दरबारियों को प्रतिवर्ष ईर्ष्या की आग में ... 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